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मेरी सैंतालीस साल की माँ, पिछले पाँच सालों में, जबसे मैंने घर छोड़ा है... शायद इन दिनों सबसे ज्यादा खुश रहती है। ये मैं नहीं, वो खुद कहती रहती हैं आजकल। उन्हें वो हर अच्छी बुरी चीज मुझे दिखानी होती हैं, जो वो इन पाँच सालों में मुझे याद कर कर के, खुद अकेली देखती रही। अकेली हंसती रही, कुठती रहीं। फिर फोन पे बताई बातों में वो स्वाद आ भी कहा पता हैं। हर पांच मिनट बाद उनका, "छोटी देख","छोटी देख" सुनाई दे देता है। चाहे वो सब्ज़ी के ठेले पर दिखा एक बहुत बड़ा तरबूज़ हो, या अलमारी साफ़ करते समय हमारे मिले पुराने कपड़े। लोग गलत ही कहते हैं कि दुल्हन के चेहरे की रौनक हसीन होती हैं। तुम कभी उस माँ का चेहरा देखो, जिसे अभी अभी पता चला हो कि उसकी सारी औलादें तीन महीनों तक सिर्फ़ उसके साथ रहेंगी। फिर से उसके प्राण पियेंगी। जो झूमती गाती, टूटे घुटनों से फुदकती, वो खिलखिला जाती हैं, मैं सोचती हूं कोई किसी से इतना प्यार कैसे कर सकता हैं।
मेरे घर के बाहर ये देहशती बीमारी हज़ारों लोगो को रोज़ाना चपेट में ले रहीं हैं, और घर के अंदर, इस आनंदित माहौल में, जाने कब ये रिवाज़ बन गया कि प्रतिदिन रात को खाना खाते समय एक पिक्चर चलाई जाएगी, जो सब साथ बैठ कर देखेंगे। कभी धर्मेन्द्र की जवानी की पिक्चर चलाई जाती हैं, जिस पर मेरे पिताजी गर्वानवित होकर कहते हैं,"बता छोटी, आजकल के हीरो कहाँ टिक पाएंगे इसके आगे"। ऋषिकेश मुखर्जी की पिक्चर चलाई जाती हैं। उनकी ' चुपके चुपके ' तो हमारी गो - टू - मूवी हो गई हैं अब। बचपन से अब तक अनगिनत बार हम ये पिक्चर देख चुके हैं, और उससे भी ज़्यादा बार ये सुन चुके हैं, कि अमिताभ बच्चन इस पिक्चर में फ़्री में काम करने को तैयार हो गया था। या किशोर कुमार की ' पड़ोसन ' चलाई जाती हैं, जिसमें उसके हर एक बदलते भाव के साथ, हमारे घर में ठहाकों की बौछारें हो जाती हैं। हर बार। मज़ाक नहीं कर रही, हर एक बार।
हर एक पिक्चर खत्म होने के बाद, किस्से कहानियों का कार्यक्रम शुरू होता हैं। पिक्चर कब, कैसे देखी गई थी से लेकर आस पास की सारी बातें याद कर, फिर से जवानी में झाँक लेने के मौके ढूंढे जाते हैं कि कैसे किराए पर वीसीआर लाया जाता था, और रात 8 बजे से सुबह 5 बजे तक में चार पिक्चर देख डाली जाती थी। कैसे सर्दियों में नीचे बड़े हॉल में, और गर्मियों में छत पर एक लंबा तार खींच कर, टी.वी लगाया जाता था। फिर अगले दिन आधी नींद में दो पिक्चरों के गाने मिला दिए जाते थे क्योंकि दोनों गानों में ही गुलाबी रंग के कपड़े पहनकर दो लड़कियां नाची थी, और अब याद नहीं की कौन सा गाना कौन सी पिक्चर में सुना था। कैसे घर में ब्लैक एंड व्हाइट टी.वी. होने के बावजूद, बड़े मामा, उनके पक्के दोस्त यशोधन मामा, याशोधन मामा के पड़ोसी मनोज मामा, मौसी, मौसी की पक्की सहेली संजू मौसी, और इनकी पूरी जमात पैसे इकट्ठे कर के कलर टी.वी. भी किराए पर लाया करते थे।
और इन्हीं कहानी किस्सों में जब दो ढाई बज जाते हैं, तब मजबूरन हम भाई बहनों में से किसी न किसी को यह कहना ही पड़ जाता है, "आपको सो जाना चाहिए अब, ढाई बज गए हैं।" फिर मोटर और वॉल्व बंद करने के निर्देश दे दिए जाते हैं, और दोनों मुस्कुराते मुस्कुराते अपने कमरे में चले जाते हैं। थोड़ी देर में उनके कमरे की बत्ती बंद हो जाती हैं। कमज़ोर नज़रों से अपने फ़ोन को एक मीटर दूर खींचकर, अपने चश्में के पीछे आँखे मिचमिचाती मेरी सैंतालीस साल की माँ, हँसते हुए, फिर से आवाज़ लगाती हैं.... "छोटी देख"।

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