~ अजीब सी बाते करता हैं वो, पर अच्छा लगता हैं, कुछ तो, बोलता रहता हैं सुनाई नहीं देती मुझे उसकी बातें सारी उसकी छाती में, मेरा एक कान धंसा रहता हैं पर जितनी भी बातें सुन पाती हूं, उसकी धड़कनों की तालमेल में, सब अच्छा लगता हैं। अब कहूं , ' शांति मिलती हैं ' तो ना तुम समझ पाओगे, और समझाना चाहूं, तो ना में समझा पाऊंगी। पर अगर अभी, तुम आकर देख पाओ तो वो शांति दिख जाएंगी तुम्हे, मेरे चेहरे पर, अभी आकर सुन पाओ, तो वो शांति सुन पाओगे, मेरे लिपटने पर और समझ पाओगे तुम, कि क्यों अच्छा लगता हैं, तुम्हारे साथ, सिर्फ तुम्हारे साथ। क्यों झेंप जाती हूं, आंखे मिंचा कर क्यों घूरती रहती हूं, चूमती रहती हूं, तुम आ पाते, तो जान पाते, कि कैसे तुम्हारी हरकतों को, तुम्हारी भीनी सी पसीने की खुशबू को, मैं सिर्फ, याद करके भी खुश हो लेती हूं, थोड़ा मुस्कुरा लेती हूं, बुरा दिन गया हो तो थोड़ा सो जाती हूं, याद करते करते, थोड़ा और बेह लेती हूं, तुम्हारी बातों में जब तुम होते नहीं हो आस - पास। पता चल पाता तुम्हे, कैसे मुझे तुम्हारे ना होने पर तुम्हें सोचना भी अच्छा लगता हैं। तुम्हारे होने ...