क्योंकि अपनी ही
साँसे खुदकी गर्दन पर नहीं जाती| ना खुदके गले को चूम पाती हूँ| और आईने में
निहारने से ज़्यादा अच्छा तुम्हारी आँखों में लगता हैं| खुद ही की बाज़ुओं में खुद
को कस लेने से दिल नहीं बैठता| ना ही वो महक आती हैं| ये तकिये तुम जैसा सिराहना
नहीं बन पाते| ना चादरों का ढ़ेर तुम्हारी छाती| दिवारों पर सटने से धड़कने तेज़
नहीं होती| और अपनी ही अंगुलियों से गुदगुदी महसूस नहीं होती| बदन पर फिरते ये हाथ
तुम्हारे होंठ नहीं बन पाते| और आँख खुलने पर तुम शांती से सोए नज़र नहीं आते|
इसलिए याद आते हो|
बस| ♥

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