~ तू अंगुलियों से, मेरे चेहरे पर, उलझे बिखरे, केस सुलझाना, फिर प्यार से दो लटों को, कान के पीछे धीरे से सरकना, और मैं आंखे बंद कर लू, तो समझ जाना, हल्की सी अपनी सांसे, मेरे करीब लाना, अपने आड़े बांके होठों से, मुस्कुराना, और मैं भी मुस्कुरां दू, तो समझ जाना, कि हाथ कमर से ऊपर, गले से नीचे ला सकता हैं अब, और ललाट पर चूमकर, मना सकता हैं अब, अपनी ओर खींच कर, धीमे से, मुँह पर, बड़बड़ा सकता हैं अब कि मेरी हैं तू! और मेरी रहेगी! मैं वही के वही, दिल ना बैठा लेती अपना, तो फिर कहता कि मैं रुकी नही, उन शब्दों में, उन सांसो में, तेरी अंगुलियों में फंसे, मेरे बालों में! इतना तो कोई ये मुश्किल नहीं था, पर चूक गया तू, आदमी|