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Showing posts from December, 2018
~हर सुबह तुम वैसी नहीं रही, जैसी हुआ करती थी वो बेफिक्री नहीं रहीं तुममे जिस पर,  दिल हार बैठा था मैं एक दफा  अब थोड़ा सोचने लगी हों खुदके, मेरे, हमारे बारे में अब चिड जाती हो, जब मैं हर चीज़ मज़ाक में ले लेता हूँ अब फिकर होने लगी हैं तुम्हे, कल की अब तुम उदास रहने लगी हो थोड़ी बदल सी गयी हो, शरीर काठी में तुम अब वैसी नहीं रही हो थक जाती हो, गुस्सा जाती हो थकान में कह देती हो दो चार बातें चुभ भी जाती हैं उनमे से कुछ मुझे फिर अनजान की तरह, तुम अपने काम में, लग जाती हो जैसे कुछ हुआ ही नहीं तुमने कुछ कहा ही नहीं मुझे कुछ चुभा ही नहीं दिल की बातें निकल जाती हैं, कभी कबार मानता हूँ मैं, इसीलिए  चुप रहता हूँ, झगड़ता नहीं और मुस्कुरा के देखता हूँ तुम्हे, जो तुम इस थकान में, इस मकान को, घर बनाने में जुट जाती हो जो तुम दुनिया भर की बातें लिए, फिर से सराहने पास आती हो कहती हो," काम बहुत था दफ़्तर में इसीलिए भड़क गयी' फिर जो तुम सुबह से शाम तक की दास्तान सी गाती हो कोहनियां हिलाती हुई,  अंगुलिया घूमती हुई, जो तुम एक एक किस्सा मुझे चैन से स...