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कुछ ठहरा नहीं हैं प्यार
कुछ गहरा नहीं हैं प्यार
सुरमे की सिलाही की तरह
कभी इधर, उधर
कभी यहाँ, वहाँ
लुड़कता डोलता हुआ
दराज़ में ही
दब के बैठा हैं कहीं
पर गहरा नहीं हैं प्यार
हल्का हैं, सुरमयी
उतर जाता हैं आँखों से कहीं
फिर गालों तक फैल जाता हैं
सलेटी आंखों से धुलकर
रूखा हैं कजरे की तरह
कभी इधर, उधर
कभी यहाँ, वहाँ
सुरमे की सिलाही की तरह
कुछ ठहरा नहीं हैं प्यार
कुछ गहरा नहीं हैं प्यार
सुरमे की सिलाही की तरह
कभी इधर, उधर
कभी यहाँ, वहाँ
लुड़कता डोलता हुआ
दराज़ में ही
दब के बैठा हैं कहीं
पर गहरा नहीं हैं प्यार
हल्का हैं, सुरमयी
उतर जाता हैं आँखों से कहीं
फिर गालों तक फैल जाता हैं
सलेटी आंखों से धुलकर
रूखा हैं कजरे की तरह
कभी इधर, उधर
कभी यहाँ, वहाँ
सुरमे की सिलाही की तरह

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