~साढ़े ग्यारह पौने बारह|⏳
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तो जब जीवन के
चालीस साल काट लोगे| उस के बाद, ये सोचने का इंतज़ार कर रहे हो कि काश चालीस साल
पहले कुछ अलग सोच लिया होता? या इस चीज़ का अफ़सोस मनाने की तलाश में बैठे हो, कि
एक दिन सुबह उठोगे, तो पत्नी सखरी पट्टी पर रोटियाँ थेंच रही होगी और बच्चें
जगागकर बोलेंगे "पापा बैल्ट ढूंढ दो बस आने वाली हैं"| और जगत भर की
गालियाँ निकालते निकालते तुम ये चिल्लाते पाए जाओगे कि रात को सब जमाकर क्यों नहीं
सोते!
फिर एक दिन यूहीं,
शायद सुबह साढ़े ग्यारह बजे, तुम्हें अचानक से लगे कि क्या जीवन भर केवल गधा
मज़दूरी करने और बीवी से रोटियाँ बनवाने के लिए पैदा हुआ था?
तो भले मानस, वो
दिन ना आए, इसलिए कह रही हूँ| जब तक चहरे पर दमक, आँखो में चमक, सर पर बाल और शरीर
में जान हैं| उठो| पैल की तरह पड़े मत रहो| बचपन में भी तो सपने देखते थे ना? कभी
डिटेक्टिव, कभी साइंटिस्ट वगरह- वगरह बनने के| कभी कुछ सोचने से पहले सोचना नहीं पड़ता
था| तो भई, वो भी तो तुम ही थे| BOB THE BUILDER के साथ "हाँ भई हाँ"
गाने वाले| 'शक्ति शक्ति शक्ति माआन' गाते- गाते सोफ़े से कूदने वाले| बीस रूपऐ की
'शाकालाका बूम बूम' वाली पेंसिल लाने वाले| वो भी तो तुम ही थे ना? वो बनते हुए
घरों के आगे पड़ी बज़री में शंख ढूंढने वाले| और पूरी रात उन्हें पानी में रखने
वाले ताकि सुबह तक वो बड़े हो जाए| तुम ही
तो थे| तो अब क्या हो गया? क्यों सुस्त हो? थोड़ी सी बद्दिमागी लगाकर देखो ज़रा,
रक्तदान से भी ज्यादा अच्छा लगता हैं| मैं तो, आज भी, मेरा कुत्ता घर में ना मिले
तो ये सोचने लग जाती हूँ कि कहीं वो Platypus perry तो नहीं? फिर पता चलता हैं
गोबर खाकर आया हैं|
उड़ने दों सोच को|
क्योंकि कुछ चालीस साल बाद, जब एक सुबह साढे़ ग्यारह पौने बारह बजे़ के अास- पास,
तुम अपनी गाड़ी के कांच से, दूर एक आदमी को ज़ोर से हँसते हुए देखोगे ना| तो दुख
होगा|
बहुत दुख|

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