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~पूर्णविराम| 
•••• तो इतना मन हैं तुम्हारा तो लो सुन ही लो फिर आज| जलन होने लगी हैं मुझे| हर उस लड़की से, हर उस लड़के से| जो तुम्हारे पास हैं| और खास भी| क्योंकि वो जगह जो उनकी हैं, वो मेरी नहीं हैं| होने को तो मुझे चाहिए भी नहीं, पर डर लगता हैं| और समझ नहीं आता कि इतने लोगों और इतनी जगहों में मेरी कौनसी हैं? और ऐसी भी कोई बात नहीं हैं कि तुम सबसे बात करना छोड़ दो| या बंधे रहो मेरे पल्लू से| पर बस बीच- बीच में ऐसा बोल दिया करो कि मैं नहीं होऊंगी तो बाकि सब बेकार लगेगा| या कि बाकि सब मुझसे कम हैं कह दोगे तब भी चलेगा| कोई ऐसा भी नहीं हैं कि भई कोई भयंकर ही जलने लगी हूँ| बस समझ जाओ खुद ही| नाप तोल में मैं वैसे भी कच्ची हूँ| और पहले ऐसा नहीं था| ना कोई डर था ना कोई जलन| पर अब हैं| और इसका मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती| ये बदलाव थोड़ा अजीब लगे तुम्हे शायद| पर एक हक सा जमाने का मन करने लगा हैं| और ये मेरी सबसे बड़ी त्रासदी हो चली हैं| कि जब तुम मेरे हो, तो क्यों कोई तुम पर उतना हक जमाए जितना मैंने जमा रखा हैं| और उन्हें और मुझे बराबर समझते हो अगर, तो तुम उन्हीं को मुबारक हो| ना मैं बांटी हुई चीजे़ं लेती हूँ, ना ही मुझे अपनी चीज़े बांटने का कोई शौख हैं|

और तुम ही बताओ किसी और को क्यों लड़ने दूँ तुमसे? भई मैं हूँ ना लड़ने को| मैं लडूंगी जितना झगड़ना हो तुम्हें| कोई और क्यों सांत्वना दे तुम्हें| मैं ज़िंदा हूँ ना अभी सम्भालने को? जो करना होगा मैं करूँगी| क्योंकि तुम मेेरे हो| और मुझे डर लगता हैं मेरी चीज़ें खो जाने का| इसलिए तुम्हें संहेज कर रखने का मन करने लगा हैं| और ये डर उम्र और समय के साथ सिर्फ बढ़ेगा| तुम समझो तो समझ लेना, वरना पूछते ही फिरना कि क्यों मैं अचानक सें रूस गई|


समझ रहे हो गंवार इंसान? या तो तुम्हारा पहला और आखिरी ख्याल मैं रहूँ, या फिर मैं ख्याल में भी ना रहूँ| क्योंकि मुझसे प्यार करना हैं, तो या तो सुर्ख साँवला करो या चिट्ट गोरा| ये बीच का गेंहूआ सिर्फ रंग होता हैं, प्यार नहीं| और ये बात तुम घोट कर पी लो तो ही बढि़या हैं| तुम्हारे लिए| मेरे लिए| और हमारे होने वाले कुत्तों के लिए भी| और ये भी समझ लेना साथ ही कि हमेशा मैं ही नहीं कहती फिरूंगी हर बात| तुम सरे आम, भरे चौराहें पर, छाती चौड़ा कर, सब लौंडें लौंडियों के सामने, ये कहने का जिगर रखो कि ना मुझसे खास कोई हैं और ना ही कोई हो पाएगा, तो ही आना| वरना ...

... वरना डूब मरना उसी समंदर में पत्थर बांध कर| मैं बिन ब्याही विधवा ही सही| और अब तुम जनम लगाओगे इसे पढ़ने में| तो सुन लो अपने फटे हुए कान के पर्दों को और फाड़ के, मोटी सी नाक थोड़ी और चौड़ा के, और होंठ...| रहने दो, पहले ही बहुत बड़े हैं| कि या तो आने वाले दो हफ़्तों में तुम लाड लड़ाकर मना लो| या मैं समझ लूंगी कि सब थोथें दिखावे थे| तो भाई साहब, अब अगला पोस्ट तब ही डलेगा जब मैं निश्चिंत हो जाऊंगी| वरना देवनागरी में लिखने का मुझे कोई शौख नहीं| तब तक के लिए मेरी कलम पर विराम हैं| पूर्णविराम|
तुम इसे मेरा स्त्री हठ समझो तो समझ सकते हो| मैं मना नहीं कर रहीं| पर ईर्ष्या हैं मुझ में| तुम्हारे लिए| और स्वार्थी हैं मेरा प्यार| आजीवन रहेगा| जब तक तुम हों| जब तक तुम मेरे हों|

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