~ 19.10.16
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हमारा मिलना कोई
इम्तियाज़ अली की पिक्चर जैसा नहीं था| ना मेरी ज़ुल्फे उड़ी, ना कभी उस ने मुझे
झट से पलट कर देखा और दिल ले गया| ना ही उस के चले जाने पर पीछे से 'पल भर ठहर जाओ,
दिल ये सम्भल जाए' बजा| मैं हमेशा मोमोज़ सी बेहुदी शकल बनाकर उसे रोकती रही, और
वो रींच्छ की तरह खड़ा रहा| पर कई बार दिल बैठ़ा जाता था| सड़क के किनारें 'तो आप
अकेले नहीं हो' बोलकर| अचानक से टपक कर 'हमेशा यहीं हूँ, चिंता मत' सुना कर| बहुत
अजीब सा लगता हैं कुछ इतना अच्छा सुनना कि सांसे गहरी हो जाए| जैसे इतनी खुशी मिल
गई हो कि बस अब मौत ही आ जाए तो बढ़िया| और हम औरतो की एक बेढ़ंगी सी आदत होती
हैं| शकल चाहे शाकाल जैसी हो, गाने चलते नहीं की हम गाने की हेरोइन हो जाते हैं|
ये जवानों की जाती मूड के हिसाब से गाने नहीं सुनती, गाने के हिसाब से मूड बदलती
हैं| जाने कितनी बार इन्हीं की वजह से मैं उस से लड़ी हूँ| वो पूछता रहा क्या हुआ
हैं, और मैं वही अपना क्लीषे डाइअलॉग मारती रही- 'कुछ नहीं'| ऐक्टिंग तो, कुछ भी
कहों, बहुत करी हैं| और बेमतलब के नाटक तो पूछो ही मत| झगड़े हैं साथ में, फिर ड़र
भी लगा हैं- "बहनचोद, मनाया नहीं तो इसने? ईगो भी आडे़ आया कई दफ़ा और बेमतलब
की लिखी-कहीं बाते भी| पर इन सब के बावजूद, मुझे हमारी कहानी पसंद हैं| जहाँ दोंनो
रोए हैं, हंसे हैं| घूमें हैं, सोए हैं| चिठ्ठियाँ लिखी हैं, लम्बी लम्बी| कहानी
जिसमें ट्रेन हैं, एयरपोर्ट हैं, कैब हैं, बस हैं ट्रक नहीं हैं और हैं स्कूटर्स|
जहाँ लड़का जाता- जाता कसकर गले लगाकर गया हैं और महीनों के बाद मिलने का वादा
करके, लड़की का दिल बैठा कर गया हैं| जैसे युद्ध लड़ने जा रहा हो! कांड़ किए हैं
साथ में, और चूतियापे भी| खूब परेशान हुए हैं, खूब परेशान किया हैं| बस के पीछे
भागे हैं, हाथ पकड़कर रोका हैं| गले पड़- पड़ कर रोए हैं, जानवरों की तरह हंसे
हैं| दूर रह कर तड़पे हैं| बिगाड़ा हैं कुछ, सीखा़ हैं कुछ एक दूसरे से| हिम्मत
बने हैं, गांड फटी हैं| चार आंखो से सौ सपने देखे हैं साथ में|
प्यार बहुत हैं| और
किस्से भी| जिन्हें पन्नो पर उतारा जा सकें| चाय और फ़ेन के साथ दोस्तों को सुनाया
जा सके| ठहाकों के साथ, आँसूओ के बीच सुना जा सके| याद किया जा सके|
इम्तियाज़ अली की
पिक्चर की ये कहानी बने ना बने, पर तेरा मेरा प्यार, जानेमन, कल्ट बनेगा कल्ट|
समझ रहे हो?

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